Author Archives: Shaily Kapil Kalra

Oh, the fall !!

Poem by Shaily Kalra The fall of leavescovering the landleaves on the ground,gloomy daysrays of sunburning like fire Worries soon are overAs I see leaves and flowers blooming out fromdead branches of trees fireflies will enlightenthe darkest nights.dead trees come to life Soon the sky will glowsepals covering petalsair filled withthe aroma of lilies and rosesBranches filled withGreen lush full

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मुझे जीने दो …

शैली कपिल कालरा द्वारा लिखी एक कविता तेज बारिशचादर से ढक कर लायीमुझे है दाईमाँ के पास रखते हुए बोलीतूने लड़की है जनाईमैं निडरअनजानमाँ की गोद में निश्चिंत ! कुछ ख़ुशी कुछ ग़ममाँ के छलकते आँसू,फिर बोलीतू छोटी नन्ही सी मेरी जानरखती हूँ जन्नत तेरा नाम पाँवों की आहटदरवाज़े पर दस्तकतेरे बाबा हैं शायद* पर तेरे बाबाक्या कहेंक्या करेंपता नहीं

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राब्दा

शैली कपिल कालरा द्वारा लिखी एक कविता दर बदर भटकते रहेमंज़िल लम्बी है अभीफ़िक्र थीडर भी था बहुत तलाश में किसी कीऔर ज़िक्र तेरा … हुआ राब्दामेरी रूह का तुझसेतो जाना मंज़िलदूर ही सहीपर सुकून हैतू साथ है।

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परिंदे कब पिंजरे में हैं रहते

शैली कपिल कालरा द्वारा लिखी कविता देखा है परिंदों कोपिंजरों में कैद होते हुएआसमान को देखतेऔर रुकसत होते हुए पिंजरे तो अक्सर हम हैं बनातेउम्मीद के पर भी ….हम हैं काटतेफिर दोष है कैसेसृष्टि का या क्रमों का परिंदे हैंउड़ान भरने के लिएना कल रुकेना रुकेंगे आज छूने आए आसमानछूकर ही जाएँगे परिंदे कब पिंजरे में हैं रहतेआज हैं अगरकल

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घरों में कमरे कमरों में घर

शैली कालरा की लिखित कविता वो जमाने थे जब घरों में कमरे सहूलियत के लिये बनते कभी हम खुद कभी चीज़ों को रख दिया करते कमरों में नहींघरों में थे हम रहते। हुआ करते थे घर कुछ ऐसेजहाँ खिड़कियाँ ज़्यादादरवाज़े कम हुआ करतेखिड़कियाँ खुलीदरवाज़े बंद रहते घर ऐसेजिनमे रौशनदान होतेथी रसोई ऐसीजहां नंगे पाँव जातेरोशन थे घर सबकेखिलखिलाती हँसीऔर मुस्कुराते चहरे घर !जहाँ छोटे

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