कोरोना: बहादुरी और… के बीच की पतली रेखा

सन्दर्भ आनंद शर्मा द्वारा लिखित

मेरे पिता ने एक बार मुझसे कहा था “बहादुरी और मूर्खता के बीच एक पतली रेखा है”। यह वाक्य बहुत लंबे समय से मेरे साथ है, और इसने मेरे जीवन के कई फैसलों को प्रभावित किया है। मैं यह स्पष्ट करना कि इन शब्दों का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति को कायर होना चाहिए, यह शब्द सिर्फ सुझाव देते है कि व्यक्ति को सावधानी और विवेक के साथ कर्म करना चाहिए।

“अनलॉक 1.0 ” और लोगों की इसके बाद की प्रतिक्रिया ने मुझे चकित कर दिया है। मेरी प्रतिक्रिया एक तस्वीर से उपजी जिसमें भीड़-भाड़ वाली मरीन ड्राइव दिखाई दी, जहाँ लोग बिना किसी परवाह के चल रहे थे, “सोशल डिस्टेंसिंग” का मज़ाक बना दिया गया , कई सेलिब्रिटी अपनी ठोड़ी को ढँकते हुए शॉर्ट्स में चल रहे थे, और कुछ बहादुर बिना “मास्क” के थे ( हाँ आपने इसे सही पढ़ा है, बिना मास्क के)। यदि वह पर्याप्त नहीं था, तो दूसरी तरफ एक और तस्वीर जहां मैंने देखा था कि लोग एक-दूसरे को धक्का दे रहे थे, आप जानते हैं कि वे क्या खरीदना चाहते थे – “समोसा और वड़ा पाव” !!!! यदि शिक्षित, “जागरूक” और अमीर नागरिक इस तरह से व्यवहार करते हैं, तो उन लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है जो अज्ञानी है?

मेरी समझ में, अनलॉक 1.0 को अर्थव्यवस्था को थोड़ा सहारा के लिए शुरू किया गया था। यह कार्यालयों, बाजारों, मंदिरों, मस्जिदों, रेस्तराओं को खोलने, ऑनलाइन शॉपिंग को फिर से शुरू करने आदि की अनुमति देने के लिए था, जो वापस सामान्य जीवन शैली के लौटने की दिशा में पहला कदम था। मेरा दृढ़ विश्वास था कि अनलॉक में भी, बुनियादी नियम — अगर जरूरी नहीं है, तो बाहर मत जाओ — लागू होगा। मुझे लगा कि यह स्पष्ट है कि अनलॉक 1.0 एक आवश्यकता थी जो अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के कारण उत्पन्न हुई, बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

जाहिर तौर पर, आम आदमी और उच्च वर्ग के लोगों के विचार अलग थे।

जैसे ही अनलॉक 1.0 शुरू हुआ। लोगों को अपने घरों से बाहर निकलते देखा गया, उसी तरह जैसे जानवर बाड़ों से बाहर भागते है , या एक अपराधी जेल ब्रेक के बाद भागता है। अधिकतम कारोबार भोजनालयों द्वारा किया गया, लोग रेस्तरां और सड़क के किनारे की दुकानों पर ऐसे इकट्ठा हुए जैसे पिछले कुछ महीनों से घरों मे कबाड़ खा रहे हों। लोग परिवार की सैर के लिए पार्कों और समुद्र तटों पर गए, खरीदारी की , जैसे कि यह सब करने का और मौका नहीं होगा। 4 लोगों को ले जाते हुए दो पहिया (टू व्हीलर ) वाहन और सामाजिक दूरी का मजाक बनाने वाले व्यक्तियों को देखना एक आम दृश्य बन गया। छोटे शहरों में, स्थिति लगभग समान थी, सिवाय इसके कि नकाब गर्दन से लटका लिया जाता था , केवल पुलिस को देखते समय चेहरे को ढंकने के लिए, वह भी जिस से जुर्माना भरने से बचा जा सके

मुझे यह समझ में नहीं आया कि हम इस तरह का व्यवहार क्यों करते हैं?  मगर फिर भी दिलचस्प बात यह है कि लोगों के पास हमेशा उनके सभी कार्यों के कारण तैयार रहते है ।

कुछ बुद्धिजीवियों को लगता है कि कोरोना उतना खतरनाक नहीं है जितना इसे बताया जाता है। कुछ लोगों के लिए यह बेरोजगारी, मंदी आदि जैसे मुद्दों से लोगों को ध्यान भटकाने का एक साधन है। व्हाट्सएप पर लोग कहते हैं कि आज दुनिया में अन्य कई कोरोना से ज्यादा खतरनाक बीमारियां हैं। कुछ “षड्यंत्र सिद्धांतकार” इस पर पूरा समय काम कर रहे हैं। बात अविश्वसनीय जरूर है, लेकिन सही है !!! यह उस समय में कहा जा रहा है जब कोरोना वायरस ने खुद को 10 बार उत्परिवर्तित (रूप बदला ) किया है, जब विशेषज्ञ बीमारी की अत्यधिक सँकरात्मकता से चिंतित हैं और और साथ साथ इस बात से भी कि यह बिमारी व्यक्ति की स्थिति में अचानक और अप्रत्याशित गिरावट का कारण बनती है, यह एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (सांस लेने मे तकलीफ, दम घुटना इत्यादि  )का कारण बनती है और अंत में, यह रक्त वाहिकाओं को अवरुद्ध करती है। यह बिमारी मुझे कबूतर की याद दिलाती है जो खतरे को देखते हुए अपनी आँखें बंद कर लेता है। आप बस यह समझ लीजिये की, बस एक पल की लापरवाही का एक विनाशकारी प्रभाव हो सकता है।

अन्य लोग हैं, जो कहते हैं, “हर किसी को एक दिन मरना है,”, “कोई भी मृत्यु से बच नहीं सकता है” और “जब समय आता है तब जाना पड़ता है”। मैं इन लोगों को उनकी “दार्शनिक दुनिया” से बाहर निकालना नहीं चाहता, खासकर जब वे जो कह रहे हैं वह सच है। हालाँकि मैं उनसे एक सवाल पूछना चाहता हूं – “आपकी मृत्यु अनिवार्य है, मैं सहमत हूं, लेकिन आप अतिरिक्त लापरवाह क्यों हो रहे हैं और आप दूसरों को नुकसान क्यों पहुंचा रहे हैं?” यदि आपको निश्चित रूप से कोरोना से मरना है, तो आप फिर आप घूम घूम के संक्रमण क्यों फैला रहे हैं? आप बहुत अच्छी तरह से घर पर रह सकते हैं और मरने की प्रतीक्षा कर सकते हैं, आपको प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है, यदि आपको मरना है, तो आपके सिर पर छत का पंखा भी गिर सकता है। एक और वाक्य जो आम है “आप जो चाहें कर सकते हैं लेकिन कोरोना आपको नहीं छोड़ेगा और आपको मार डालेगा” …। यदि आप वास्तव में इस पर विश्वास करते हैं तो आप बेशक इसकी प्रतीक्षा करें, लेकिन कृपया घर बैठे ही प्रतीक्षा करें।

एक और समूह है जो महसूस करता है कि वे इतने अच्छे और धार्मिक हैं कि कुछ भी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचा सकता है। वे अपने आत्मविश्वास पर सवार होकर घूम सकते हैं, लेकिन तथ्य यह है कि कोरोना इस बात की परवाह नहीं करता है कि आप कौन हैं, आप किस धर्म का पालन करते हैं, आप किस जाति से हैं या आप किस देश से हैं।

कई और है जिनको मास्क बंधन लगता है, मगर महोदय, यदि आपको लगता है कि आपको मास्क की आवश्यकता नहीं है, तो ठीक है, लेकिन वे मास्क केवल आपके लिए नहीं हैं। यदि आप इसे अपने लिए नहीं पहन सकते, तो इसे दूसरों के लिए पहनें। अपनी रक्षा करें और दूसरों को बख्शें। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति कोरोना वाहक है, तो कल्पना करें कि मास्क कितना उपयोगी होगा और इससे कितने जीवन बचेंगे। जब भी आपको मास्क पहनने के बारे में संदेह में हों, तो अपने आसपास के वरिष्ठ नागरिकों और अपने आसपास के अन्य लोगों के बारे में सोचें।

कोरोना ने हमारे आसपास की दुनिया को बदल दिया है, मूल रूप से सब कुछ बदल दिया है, मुख्य रूप से “स्वतंत्रता” की मूल अवधारणा। हर जगह नियम और प्रतिबंध हैं। निराश होना स्वाभाविक है। मैं समझता हूं, लेकिन प्रिय, समाज के प्रति आपका भी कुछ कर्तव्य है, राष्ट्र को आपकी जरूरत है। देश के सभी नागरिकों को सावधान रहने की जरूरत है और इस बीमारी से लड़ने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं करना चाहिए ।

याद रखें “बहादुरी और मूर्खता के बीच एक पतली रेखा है”

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