परमपावन दलाई लामा.

प्रेरणा मेहरोत्रा गुप्ता द्वारा लिखित।

दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म के अग्रणी आध्यात्मिक नेता के लिए तिब्बती लोगों द्वारा दिया गया एक शीर्षक है। 14 वें और वर्तमान दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो, तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं, जो भारत में शरणार्थी के रूप में रहते हैं।दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर और दलाई लामा के वंशज करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप माने जाते हैं। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से परमपावन भी कहा जाता है।

तिब्बतियों को उनके मानव अधिकारों को दिलवाने में दलाई लामा ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दलाई लामा को विश्व में उत्कृष्ट काम करने, जैसे विश्व में शांति बनाये रखने के लिए नोबल शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।हालांकि, दलाई लामा को चीन से काफी विद्रोह का सामना करना पड़ा यहां तक की, उन्हें तिब्बत से बल पूर्वक निकालने की कोशिश की गई थी, इसके बाद भी उन्होंने विरोध नहीं किया और वे भारत के धर्मशाला में आकर बस गए।

दलाई लामा बेहद करुणामयी स्वभाव वाले परमपावन मानव हैं, जो कि चीन की क्रूरता के बाद भी वे चीन के प्रति दया का भाव रखते हैं।साल 1950 के दशक से ही चीन और तिब्बत के बीच में आपसी मतभेद हो गए थे, जिसकी वजह से चीन समय समय पर तिब्बत पर कई बार हमले करता रहा और चीन द्वारा तिब्बत की जनता पर अत्याचार काफी बढ़ गया।यही वजह थी की तिब्बत के लोगो ने दलाई लामा को राजनीति मे आने के लिए कहा, लेकिन राजनीति में आने से पहले ही दलाई लामा कई चीनी नेताओं से मिले और शांति वार्ता के लिए बीजिंग भी गए, लेकिन इससे भी यह मसला हल नहीं हुआ।

1959 के दौरान लोगों के अंदर क्रोध के बीज ने घर कर लिया , ऐसे में दलाई लामा का जीवन भी खतरे में पड़ गया, क्योंकि चीन, दलाई लामा को अलगाववादी मानता था, साथ ही तिब्बत पर कब्जा करने के लिए दलाई लामा को अपना एक बहुत बड़ा बाधक मानने लगा था।जिसकी वजह से दलाई लामा को चीनी सैनिकों का विद्रोह झेलना पड़ा और यही नहीं उन्हें तिब्बत छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। 17 मार्च, 1959 को उन्होंने तिब्बत छोड़कर भारत की शरण ली और तब से वे उत्तर भारत के हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रह रहे हैं।

बौद्ध धर्म में कर्म को ही सबसे उच्य स्थान दिया गया है, कहते है ना जो जैसा बोता है वैसा ही पाता है, इतिहास गवाह है कि चीन ने बहुत से निर्दोषो पर अत्याचार किया है और आज पूरी दुनिया कोविद-19 के प्रकोप से लड़ रही है जिसका स्त्रोत भी चीन ही है। चीन के अपने कर्मो की वजह से ही आज विश्व भर में लज्जा का पात्र बना हुआ है।

दलाई लामा तो करुणा के सागर है उन्होंने अपने धर्म के खातिर, चीन के इतने अत्याचार सहे, आइये इस लेख के माध्यम से उस दिव्य आत्म की सोच पर एक नज़र डाले, जो उन्होंने बुद्धा के दिये हार्ट सूत्रा का अध्ययन करके पाया।।

  • खुशी अपने आप कभी किसीको बनी बनाई नहीं मिलती है | यह अपने खुद के कार्यों से पाई जाती है|
  • सफलता का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि आपको किसी दूसरे से बेहतर बनना है, जबकि सफलता का मतलब यह है कि जो अभी आप हैं आपको उससे भी बेहतर बनना है।
  • यदि आप दूसरों की मदद कर सकते हैं तो करें, अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं, तो कम से कम उन्हें नुकसान मत पहुंचाएं.
  • यदि आप दूसरों को खुश देखना चाहते हैं तो करुणा का भाव रखें | यदि आप स्वयं खुश होना चाहते हैं तो भी करुणा का भाव रखें.
  • वास्तव में सच्चा नायक वही होता है जो कि अपने गुस्से और नफरत पर विजय प्राप्त कर लेता है।
  • मेरा धर्म बहुत सरल है. मेरा धर्म दयालुता है.
  • मंदिरों के लिए कोई ज़रूरत नहीं है, जटिल दर्शन की भी कोई ज़रूरत नहीं है. मेरा दिमाग और मेरा दिल मेरे मंदिर हैं, मेरा दर्शन दया।
  • हम बाहरी दुनिया में शांति कभी नहीं प्राप्त सकते हैं जब तक हम खुद के साथ शांति न बना लें
  • मनुष्य आपनी क्षमता और आत्म विश्वास के साथ, एक बेहतर दुनिया का निर्माण कर सकता हैं.

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