भगवान महावीर और उनके पाँच व्रत।

प्रेरणा महरोत्रा गुप्ता द्वारा लिखित।

भगवान महावीर जैन धर्म के चौंबीसवें तीर्थंकर है।तीस वर्ष की आयु में महावीर ने मोह माया, राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये।हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में चरम सीमा पर था, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद हो। यही महावीर का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत है।

क्षमा के बारे में भगवान महावीर कहते हैं- ‘मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूँ। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्रीभाव है। मेरा किसी से बैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा माँगता हूँ। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ।’

धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। महावीरजी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।जैन समाज द्वारा महावीर स्वामी के जन्मदिवस को महावीर-जयंती तथा उनके मोक्ष दिवस को दीपावली के रूप में धूम धाम से मनाया जाता है।

आज महावीर-जयंती के पावन पर्व पर भगवान महावीर के बताये उन पाँच व्रत को दोहराते है और कोशिश करते है उन्हें अपने जीवन में अपनाने की।

अहिंसा –जैनों द्वारा लिया गया पहला प्रमुख व्रत है अहिंसा जिसमे मनुष्यों के साथ ही सभी जीवित प्राणियों को कोई भी नुकसान नहीं पहुँचाना है।यह जैन धर्म में सर्वोच्च नैतिक कर्तव्य है, और यह न केवल किसी के कार्यों पर लागू होता है, बल्कि मांग करता है कि किसी के विचारों में भी हिंसा का भाव ना हो। भगवान महावीर का कहना है कि इस लोक में जितने भी जीवित जीव (एक, दो, तीन, चार और पाँच इंद्रीयों वाले जीव) है उनकी हिंसा मत करो, उनको उनके पथ पर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने उपदेशों से हमें देते हैं।

सत्य ― उनकी प्रतिज्ञा हमेशा सच बोलने की है। न तो झूठ बोलें, न ही बोलें जो सच नहीं है, दूसरों को झूठ बोलने के लिए प्रोत्साहित न करें और ना ही जो कोई असत्य बोलता है, उसे स्वीकार करो।जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है, वह मृत्यु को भी आसानी से पार कर जाता है।

अस्तेय – दुसरे की वस्तु बिना उसके दिए हुये ग्रहण करना, जैन ग्रंथों में इसे चोरी कहा गया है।इसके अतिरिक्त, एक जैन याचक को किसी से भी कुछ लेने से पहले उसकी अनुमति लेनी चाहिए।

अपरिग्रह –इसमें सामग्री और मनोवैज्ञानिक संपत्ति के प्रति लगाव, और लालच से बचना शामिल है। जैन भिक्षु और भिक्षुणी पूरी तरह से संपत्ति और सामाजिक संबंधों का त्याग करते हैं, न किसी चीज़ का मोह, और न ही किसी से भी जुड़ते हैं.जो आदमी खुद सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा संग्रह कराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की राय देता है, उसको दुःखों से कभी छुटकारा नहीं मिल सकता। यही संदेश अपरिग्रह के माध्यम से भगवान महावीर दुनिया को देना चाहते हैं।

ब्रह्मचर्य– महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चरित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जो भिक्षुओं का मार्ग अपनाते हैं, उनके व्यवहार में ब्रह्मचर्य, शब्द और विचार अपेक्षित हैं। आम लोगो के लिए जो जैन विवाहित हैं, ब्रह्मचर्य के पुण्य के लिए अपने चुने हुए साथी के प्रति वफादार रहना।ब्रह्मचर्य अपने भौतिक अर्थ में हमारी सभी 5 इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना है; और यह केवल मन के नियंत्रण से किया जा सकता है।इंद्रियों का नियंत्रण अनिवार्य रूप से विचारों का नियंत्रण है।

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