माँ सीता-एक शक्ति।

प्रेरणा महरोत्रा गुप्ता द्वारा लिखित.

माता सीता हिंदू महाकाव्य, रामायण और इसके अन्य संस्करणों में केंद्रीय पात्रो में से एक मुख्य महिला पात्र हैं । सीता का पालन-पोषण राजा जनक और उनकी पत्नी रानी सुनैना ने किया था, वह उनकी प्राकृतिक बेटी नहीं थी क्योंकि एक बार जब राजा खेत जोत रहे थे माँ सीता उन्हें वही पुत्री के रूप में प्राप्त हुई थी,इसलिए उन्हें पृथ्वी देवी, भूमि या पृथ्वी की बेटी के रूप में वर्णित किया गया है.विदेह के राजा जनक और उनकी पत्नी, रानी सुनैना की दत्तक पुत्री।

इनका विवाह अयोध्या के नरेश राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्री राम से स्वयंवर में शिवधनुष को भंग करने के उपरांत हुआ था।राम ने सीता माँ को अपनी दुल्हन के रूप में पाया था। जब विवाह के उपरांत श्री राम चौदह वर्ष के वनवास में गये तब माँ सीता भी अपना सारा ऐशो आराम, राज पाट त्याग कर अपने पति श्री राम के साथ गई थी।

रावण द्वारा, उनका हरण करके, लंका ले जाने के बावजूद, माँ सीता ने अपने लंबे कारावास के दौरान भी राम पर अपना ध्यान केंद्रित करके खुद को पवित्र रखा। श्री राम के लौटने पर माँ सीता ने अपनी पवित्रता का दावा किया और आग से अग्नि परीक्षा द्वारा स्वेच्छा से अपनी पवित्रता का प्रमाण दिया।

हालांकि, समाज ने फिर भी माँ सीता की पवित्रा पर संदेह किया और माँ सीता को फिर से सब कुछ त्याग कर वन प्रस्थान करना पड़ा। वहाँ उन्होंने अपने दो बच्चों, कुश और लव को जन्म दिया। जब ये समाज ये समझ गया कि वह निर्दोष थी और राम द्वारा उनके पुत्र होने की बात स्वीकार की गई, तो उन्होंने अपनी मां, पृथ्वी से उन्हें अपनी शरण में लेने के लिए आग्रह किया और भूमिजा भूमि में ही समा गई।

माता सीता को उनके समर्पण, आत्म-बलिदान, साहस और पवित्रता के लिए जाना जाता है।
स्वामी विवेकानंद ने माँ सीता का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है।
माँ सीता वह सबसे खूबसूरत चरित्र था जो कभी इस धरती पर रहता था।स्वामी विवेकानंद ने कहा कि यदि अतीत के विश्व साहित्य और भविष्य के विश्व साहित्य को पूरी तरह से भी खंगाल लिया जाए, फिर भी, दूसरी सीता को खोजना संभव नहीं होगा, क्योंकि सीता अद्वितीय हैं। स्वामी विवेकानंद ने महसूस किया कि कई राम, शायद रहे होंगे, लेकिन कभी एक से अधिक सीता नहीं।

आइये माँ सीता के सम्पूर्ण जीवन शैली से कुछ सीख लेते है।

एक गहरे शिक्षार्थी बनो -माँ सीता के बचपन में अगर हम झांके तो पाएंगे कि वह सबसे प्रश्न बहुत करती थी क्योंकि वह हर चीज़ की गहराई को सहजता से सीखना व समझना चाहती थी।इस कथन से हम सीता माँ से यह सीख सकते है कि अगर किसी चीज़ का ज्ञान हमे नहीं है तो किसी से कुछ पूछने में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता है, इसलिए सदा अपने प्रशनो के उत्तर को खोजो।

जीवन की हर परिस्थिति को मस्कुराकर स्वीकारो-शादी के बाद जैसा हर लड़की सोचती है कि वह सुख और शांति से अपने परिवार के साथ अपना जीवन बिताये। ऐसे ही शायद सीता माँ ने भी सोचा होगा, लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंज़ूर था और उन्हें विवाह के तुरंत बाद ही चौदह वर्ष के लिए वनवास के लिए प्रस्थान करना पड़ा. इतना ही नहीं रावण द्वारा हरण के बाद अपने को पवित्र साबित करने के लिए माँ को अग्नि परीक्षा से गुज़रना पड़ा। वनवास का दुख झेलने के बाद भी इस समाज ने उन्हें सुख शांति के साथ उनके परिवार के साथ नहीं रहने दिया। गर्भ वती होने के बावजूद भी वह सब त्याग हमेशा के लिए सन्यासी बन गई और धरती माँ की बेटी अंत में धरती माँ की गोद में ही समा गई।

अंत तक अपनी गरिमा को बनाये रखो– अनंत काल तक अपनी गरिमा को बनाये रखने के लिए, सीता माँ ने ख़ुशी ख़ुशी मौत को भी गले लगा लिया लेकिन कभी वो गलत के आगे नहीं झुकी। एक अच्छी बेटी, बहन, पत्नी, बहू, भाभी और माँ बनकर उन्होंने अनंत काल तक के लिए अपना जीवन सफल बनाया।

संकट के समय साहसी बनो -रावण ने अपने मामा मारीच के साथ मिलकर सीता अपहरण की योजना रची थी। इसके अनुसार मारीच सोने के हिरण का रूप धर राम व लक्ष्मण को वन में ले गया और उनकी अनुपस्थिति में रावण ने सीता माँ का अपहरण किया। आकाश मार्ग से जाते समय पक्षीराज जटायु के रोकने पर रावण ने उसके पंख काट दिये।जब कोई सहायता नहीं मिली तो माता सीताजी ने अपने पल्लू से एक भाग निकालकर उसमें अपने आभूषणों को बांधकर नीचे डाल दिया। नीचे वन मे कुछ वानर इसे अपने साथ ले गये और उनकी इसी बुद्धि तत्परता की वजह से श्री राम उन्हें ढूंढ पाए। इतना ही नहीं रावण ने कुछ राक्षसियों को उनकी देख-रेख का भार दिया, माँ सीता उनसे भी नहीं डरी और पूरी निष्ठां के साथ हर कठिन से कठिन परिस्थिति का अपने दम पर सामना किया। श्री राम के साथ पूरी सेना थी लेकिन माँ सीता ने आजीवन अकेले अपने विश्वास के दम पर सारे युद्ध जीते।

One comment

  • सबसे अच्छा आप हो सकते हैं, सबसे खराब परिस्थितियों में

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