खुदसे सवाल कर, अब तुम केवल खुदको ही पहचानो।

प्रेरणा महरोत्रा गुप्ता द्वारा लिखित.

भारत वो पवित्र स्थान है जहाँ ज्ञान की उत्पत्ति हुई। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है. लोगो का ध्यान सच्चे ज्ञान से दूर हो रहा है। आइये आज इस लेख के माध्यम से जानते है कि सच्ची पूजा क्या है? और ये कैसे पता चलता है कि इंसान ने परमात्मा की बात सही तरीके से समझी भी है या नहीं और उसके क्या लक्षण है।

1.ईश्वर को अपने अंदर ढूँढना।
दोस्तों ईश्वर की दी हुई हर पवित्र किताब को पढ़कर हमने सबसे पहले यही जाना है कि परमात्मा का एक अंश हर एक जीव के अंदर पनपता है जिसकी शरण में जाने की उम्मीद ईश्वर हमसे रखते है। वह चाहते है कि हम उन्हें अपने अंदर ही खोजे और इतिहास गवाह है कि हर सफल इंसान ने उन्हें अपने अंदर ही ढूंढा और अंत में पाया भी।

2.खुदपर नियंत्रण लगाना।
जो इंसान ईश्वर की दिखाई राह पर चलता है. वो खुदपर नियंत्रण पहले लगाता है ऐसा व्यक्ति कभी किसी के रास्ते में नहीं आता. दूसरों की ना सुन वो बस अपनी ही नहीं चलाता। दूसरों में गलतियाँ देखने के बजाये पहले वो खुदको सुधारता है क्योंकि यही एक मात्र रास्ता है दूसरों को भी सही ज्ञान तक पहुंचाने का।

3.करुणा
ईश्वर के हर सच्चे भक्त में करुणा होती है। वह बात-बात पर गुस्सा कर खुदको महान नहीं दिखाता। बल्कि खुदको संभाल वो दूसरों में भी अपना निस्वार्थ प्यार लुटाता है। उसमे मैं का घमंड नहीं होता।

4.गलत का साथ ना देना।
कभी-कभी अच्छे इंसान को उसका अच्छा होना उसे दुख देता है क्योंकि लोग अच्छाई का फ़ायदा भी उठा लेते है। इसलिए ईश्वर का सच्चा भक्त अच्छाई को बचाये रखने के लिए कभी-कभी गलत ना होकर भी गलत बन जाता है क्योंकि वो ये जानता है कि गलत का साथ देना भी गलत होता है. इसलिए गलत का साथ छोड़ वो अपनी मंज़िल खुद बनाता है. जिसके लिए उसे कई कड़ी परीक्षा भी देनी पड़ती है।

5 . दुख में भी मुस्कुराना।
सच्ची भक्ति या पूजा केवल वो ही नहीं जो सुख में ही की जाती है क्योंकि भक्त का नाता अपने ईश्वर से इतना अटूट होता है कि दुख को भी वो अपने ईश्वर का प्रसाद समझ कर स्वीकारता है. जीवन की हर परिस्थिति में वो ईश्वर की सच्चे दिल से पूजा करता है.

6 . कर्म प्रधान।
ईश्वर का सच्चा भक्त अपने कर्मो पर ज़्यादा ध्यान देता है बजाये अपने ईश्वर की पूजा करने में क्योंकि वो ये समझता है कि ईश्वर भी उन्ही का ही साथ देते है जिनके कर्म अच्छे होते है।

7.जाति और धर्म।
ईश्वर की बातो को सही से समझने वाला व्यक्ति कभी जाति और धर्म देख कर लोगो से सम्बन्ध नहीं बनाता वह केवल इंसानियत का ही धर्म अपनाता है और सबसे (हर जीव ) से प्रेम करता है।

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