श्रीमद् भगवद् गीता,पर आधारित सफलता के लिए 10 महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश.

प्रेरणा महरोत्रा गुप्ता द्वारा लिखित.

श्रीमद् भगवद् गीता, संस्कृत में हिंदू धर्म का एक काव्य शास्त्र है जो महाभारत का एक हिस्सा है और इसका शाब्दिक अनुवाद गीता में भगवान कृष्णा द्वारा किया गया  है. गीता अर्जुन,जो पांडव राजकुमार थे और उनके सारथी भगवान कृष्ण के बीच एक संवाद की कथात्मक रूपरेखा है।

श्रीमद् भगवद् गीता, कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरुआत से पहले शुरू होती है, जहां पांडव राजकुमार अर्जुन युद्ध के मैदान पर संदेह से भरते हैं कि उनके दुश्मन उनके अपने रिश्तेदार, प्यारे दोस्त और श्रद्धेय शिक्षक हैं। पांडवों और कौरवों के बीच धर्म युद्ध लड़ने के लिए एक योद्धा के रूप में कर्तव्य का सामना करते हुए, अर्जुन को अपने क्षत्रिय (योद्धा) कर्तव्य को पूरा करने और धर्म की स्थापना के लिए श्रीकृष्ण द्वारा परामर्श दिया जाता है। श्रीमद् भगवद् गीता मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति और किसी भी उम्र में किसी के लिए भी जीवन में सफलता प्राप्त करने के तरीकों से संबंधित दृष्टिकोणों को बदलने के बीच एक संवाद है।

हमने यहां भगवद गीता पर आधारित 10 सबसे दिलचस्प दिशानिर्देश सफलता के लिए एकत्र किए हैं।

1.हमारा कर्तव्य हमारा दायित्व ही हमारा धर्म है. भगवान श्री कृष्णा कहते है, कर्म ही पूजा है और हमे कभी अपने कर्तव्य से भागना नहीं चाहिये। अपितु डट कर हर मुकाबले का सामना करना चाहिए कायरों की तरह उससे भागना नहीं चाहिये क्योंकि सही दिशा में किया हुआ हर कर्म ही धर्म है।

2.जो होता है केवल अच्छे के लिए ही होता है. “जो भी हुआ, अच्छे के लिए हुआ, जो भी हो रहा है, अच्छे के लिए ही हो रहा है। जो भी होगा, अच्छे के लिए ही होगा। ” गीता का यह उद्धरण हमारे साथ कई बार गूंजता है जब जीवन जिस तरह से हम चाहते हैं, वैसे नहीं चलता जैसे जब दुख समाप्त नहीं होते हैं और भाग्य फिर भी एक लंबा रास्ता तय करता है। इसका सीधा सा मतलब है कि हर असफलता के पीछे भगवान श्रीकृष्ण की हमारे हित के लिए एक बड़ी योजना होती है।

3.यह शरीर हमारा, हमारी आत्मा का केवल एक वस्त्र है। हमारी आत्मा का अंत नहीं हो सकता, यह अमर है। भौतिक रूप की समाप्ति( मृत्यु) यह संसार की प्राकृतिक प्रक्रिया है। साधारण शद्बों में समझाते हुये भगवान श्री कृष्णा कहते है “जैसे कि एक आदमी अपने पहने हुए कपड़ों को उतारता है और दूसरे नए कपड़े पहनता है, वैसे ही आत्मा अपने घिसे-पिटे शरीर से बाहर निकलती है और दूसरे नए शरीर में प्रवेश करती है इसे दूसरा जन्म भी कहते है, इसलिए ईश्वर कहते है किसी भी चीज़ का मोह ना करते हुये केवल अच्छे कर्म करो क्योंकि यहाँ सब नश्वर है।

4.मृत्यु एक अवसर है जो दूसरी यात्रा शुरू करने का मौका देती है। मृत्यु कोई बड़ी विपत्ति नहीं है। जैसा कि गीता में उल्लेख किया गया है, “निश्चित रूप से, जन्म लेने वाले सभी की मृत्यु निश्चित है।इसलिए किसी के जाने का ज़्यादा गम नहीं करना चाहिए। ” यह वास्तव में, एक आध्यात्मिक अवसर, वह मार्ग है जो सर्वोच्च प्रभु के साथ परिपूर्णता की ओर ले जाता है।

5.परिवर्तन अपरिहार्य है.इस ब्रह्मांड में सब कुछ स्वयं बदलता है जो परिवर्तन के सार्वभौमिक कानून के अधीन है। हमारे जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, गीता आपको परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए कहती है। धन और सभी भौतिक संपत्ति खत्म हो जाएंगी, रिश्ते टूट जाएंगे और आप बिखर जाएंगे, फिर भी आपको यह सब स्वीकार करना पड़ेगा। एक नई शुरुआत फिर से शुरू से शुरू करनी होगी, यही बदलाव का नियम है।

6.जीवन में संतुलन का सार.जीवन में समय कभी एक सा नहीं रहता सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख आता ही आता है। बुरे वक़्त में यह सोचें कि यह वक़्त भी गुजर जाएगा। आप केवल किसी से प्यार नहीं कर सकते और न ही केवल किसी से नफरत कर सकते हैं, क्योंकि दोनों ही हमारे जीवन में अपने अपने समय पर आते हैं, वे सिक्के के दो पहलू हैं और आप कभी नहीं जान सकते किस वक़्त क्या आयेगा इसलिए बीच में रहिये न ख़ुशी में बहुत ज़्यादा खुश और दुःख में बहुत ज़्यादा दुखी। 

7.बुरा वक़्त हमे सर्वश्रेष्ठ बनाता है.मन और आत्मा सतत विकास की प्रक्रिया में हैं। आपका सबसे कठिन समय आपको जमीन पर फैक सकता है, हो सकता है एक सांस लेनी भी आपको भारी पड़े, लेकिन यह वह समय होगा जो आपको आपके जीवन के सबसे मूल्यवान सबक सिखाएगा इसलिए जीवन में हर समय खुशहाल ही रहने की उम्मीद न करें।

8.अपना सब कुछ समर्पण कर दो.श्रीकृष्ण ने कहा कि अच्छे कर्म में विश्वास करो और अपने प्रत्येक कर्म को भगवान को समर्पित करो। जीवन की सारी उत्पत्ति स्वयं भगवान से हुई है और अंतिम गंतव्य भी स्वयं भगवान ही है।

9.बिना किसी अपेक्षा के कर्म करो. कर्म करने का अधिकार,आपके पास है लेकिन फल का नहीं इसलिए बिना किसी अपेक्षा के केवल  कर्म करो.अपने कर्मों का फल भी समर्पण करो क्योंकि तुम्हारे अच्छे कर्म द्वारा जो भी तुम्हारे भाग्य में आयेगा उसे तुमसे कोई भी छीन नहीं सकता।  इसका उल्लेख पवित्र पाठ में किया गया है।

10.विश्वास की शक्ति.“एक आदमी अपनी धारणा से बना है। जैसा कि वह खुदको मानता है वह वैसा ही बन जाता है। यदि आप मानते हैं कि आप जीत सकते हैं, तो आप पहले से ही इसका अधिकांश भाग जीत चुके हैं। यकीन मानिए कि आप हर हाल में खुश रह सकते हैं, आप भी सफल हो सकते हैं और आप कर सकते हैं क्योंकि आप जैसा सोचेंगे वैसा ही होगा

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