थोड़ा दर्द,थोड़ी ख़ुशी तो सबके हिस्से में आती है।

सुख ने दर्द में भी मुस्कुराते हुये, दर्द से पूछा,
ए दर्द मेरे सुख से, तू इतना जलता क्यों है??
मेरा थोड़ासा सुख भी, तुझे इतना खलता क्यों है??

मेरी तो प्रवर्ति ही है, दर्द में भी मुस्कुराने की,
चुभती तो मुझे भी है, कई बातें  ज़माने की। 

फिर भी अपने को थामे, मैं मुस्कुराता हूँ। 
दर्द को भी अपने, मैं प्यार से गले लगाता हूँ। 

सुन कर यह बात, दर्द को भी, फिर रोना आ गया,
दर्द का कारण भी, फिर दर्द को समझ आ गया। 

लेके बैठा रहता था, दर्द ही अपने सारे गम,
भुला नहीं सका, वक़्त पर वो ही अपना गम। 
फिर कैसे बढ़ाता वो ना समझ अपना दम??
चिढ़ता रहा सुख से, समझता रहा वो खुदको कम। 

ऐसा नहीं जो आज सुखी है,
उसने कभी दुख नहीं झेला है। 
जीवन की पीड़ाये तो समान है,
क्योंकि सबका जीवन ही,
सुख और दुख का मेला है।

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