क्षत विक्षत आत्माएँ-जीवित भी,मृत भी

आनंद प्रकाश द्वारा लिखित

यौन दरिंदे, हैवानियत, जली अधजली लाशें और क्षत विक्षत आत्माएँ-जीवित भी, मृत भी….
यौन  पीड़िता कर रहीं  
पल पल  यही  गुहार।
जैसे भी हो  तुरत ही
देयो  दरिन्दे मार।।

पर उनकी सुनता कौन है? संसद  और  विधान सभाओं में बलात्कारियों की मौजूदगी, संवेदनहींन राजनीति, दलों की  दलदल, स्वार्थ, निर्लजता और उपेक्षा के  नक्कारखानो  के  शोर में पीड़िताओं के विलुप्त होते टूटेफूटे बेबस, लाचार, निर्बल स्वर ।

जिन पर इन स्वरॉ को मूर्तरूप  देने का दायित्व है,उनका हाल ये कि…
सरकारें चुपचाप हैं
न्याय प्रणाली ठप्प।
राजनीति की रोटियां
तरह तरह की गप्प।।

देश की पीड़ित बेटियों  के दर्द की गहराई में अगर  संवेदनाओ के पैमाने उतारे जाएं, तो उनकी, अपराधियों को तुरंत मार देने की, मांग जायज भी है और न्याय प्रिय भी ।
पर मेरा यहां एक लघु निवेदन है : “तुरंत “को “शीघ्र”के ढांचे में  ढाल दें; उनका अपराध सिद्ध हो जाने तक ! इसके लिए दो महीने से तीन  महीने का समय पर्याप्त है। अपराध सिद्ध होते ही तुरंत फांसी ।

साथ एक चेतावनी भी : सरकार और न्यायपालिका को  यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि समाज का क्रोध उबाल पर है; यदि ये दोनों अपने कर्तव्य की समय सीमा निर्धारित नहीं करेंगे, तो जनता स्वयं न्याय करेगी l इससे अराजकता के दरवाजे खुलने की  बड़ी  आशंका है, जो  देश के लिए भी भयावह है  और समाज के लिए भी ….
जनता गुस्से में बहुत
नहीं करेगी माफ ।
फांसी दो या दो हमें
हम देंगे इंसाफ।

समय आ गया है कि सभी चेते ;  जिससे जानवरों को अपने  बाड़े से  बाहर आने की हिम्मत ही न पड़े । आओ; फिलहाल इस नारी व्यथा को आंदोलन में बदलें और शुरुआत करें राजनीति के उन बलात्कारी  दरिंदों से , जिनके माथे पर कलंक के काले टीके लगे हैं।

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