पराली : समाधान तो हैं नीयत नहीं

आनंद प्रकाश द्वारा लिखित

दावानल सी पराली, गैस चैंबर मैं परिवर्तित दिल्ली, बेचैन किसान, संवेदनहीन सरकारँ और दम घुट घुट कर मरते लोग….

लोगों की ये दुर्दशा
कुरसी है चुपचाप।
सुनता कोई भी नहीं
भाजपा ना आप।।

आखिर इन सरकारों के कान पर जूं रेंगे भी, तो रेंगे कैसे ? इसके लिए किन्ही भी उपायों के माध्यम से इन्हें यह मानने के लिए मजबूर किया जाए कि…..

सरकारों को चाहिए
खेत खेत पर जायं ।
पैसे देयं किसान को
उठा पराली लायं।।

ये चाहें तो समस्या चार दिन में सुलझ सकती है,पर इनके पास बहाने बहुत हैं : आदमी कहां से आएंगे,पैसा कौन देगा, उठाएगा कौन, उसका करेंगे क्या ?


यहां इन्हें रोके और बताएं कि पिछले साल ही प्लास्टिक के विकल्प के रूप में पराली से….

प्लेट प्याली तश्तरी
पल में दईं बनाय।
आईआईटी के छात्र ने
रस्ता दियो दिखाय।।

इनके पास इतना बडा सरकारी तंत् है,संगठन हैं, पंचायतें हैं, कॉरपोरेशंस हैं। मुश्किल कुछ भी नहीं । कमी है तो इच्छा शक्ति की, दृढ़ संकल्प और थोड़ी संवेदना की !
वरना हम तो मर ही रहे हैं ।और आप ? आप बहुत खुशकिस्मत हैं कि दिल्ली या एनसीआर में नहीं रहते, वरना आप भी . …

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