बेफिक्र सा ये वक़्त गुज़रता रहा

शैली कालरा की कविता

शूल सा चुभ रहा
तीर सा घुसा हुआ
ना दर्द का अहसास इसे
ना प्यार का आभास है
बेजान फूल सा
यहाँ वहाँ पड़ा हुआ ।

क्रोध और अहंकार में
जलता खड़ा रहा
ना जानता कल क्या ?
ना जानता है आज क्या ?
ना आसुओं का मान इसे
ये पल दो पल की बात में
रेंगता सा निकल गया ।

आज की बात में
रोक ले कोई इसे
पूछ ले कोई ज़रा
कुछ शुभ हुआ क्या ?
पर अनजान सा
बढ़ता चला गया ।

बहुत निडर है
बहुत चंचल भी
सुनी कब इसने कभी
बेफ़िक्रा सा
ये वक़्त गुज़रता गया ।

प्रतिशोध की आग में
सब कुछ साथ लेगया,
ना कल में था
ना आज में है
जलते अंगार सा
खाख में मिल गया ।

वक़्त के बहाव को
रोक सको तो रोक लो
ये रुकता नहीं ये झुकता नहीं
अपश्चात्तापी और निर्भीक सा
रोकना चाहा इसे
तो रेत सा फिसल गया ।

ना जाने कितनो को
रौंधता चला गया
पश्चात्ताप की आग में
जलता सा छोड़ गया
पास इसके थे खड़े
पर राणा जी के
अश्व सा दौड़ता चला गया ।

लेखिका शैली कालरा

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