कभी चले थे घर से — लेखिका प्रेरणा मेहरोत्रा ​​गुप्ता

प्रेरणा मेहरोत्रा ​​गुप्ता की कविता

कभी चले थे घर से, आँखों में लेके सपने।
पीछे छूटे थे, ना जाने मेरे कितने अपने।
कई बार आँखों में भर, यादो के आँसू, हमने खुदका हाथ थामा था।
हमारे इस बदलते रूप का कारण, बन बैठा ये ज़माना था।

शरारतें करके, हम अक्सर यू अपना, ये दिल बहलाते थे।
इम्तिहान की रातो में, हम सारे दोस्त ही घबराते थे।
परीक्षा हॉल में, एक दूजे को, अक्सर ही, नक़ल हम कराते थे ।
जो हो भी जाये कोई दोस्त हमसे दूर,
फिर इशारों के ज़रिये, हम उसे भी उत्तर बताते थे।

दोस्त की गर्ल फ्रेंड को, खुलेआम हम अपनी भाभी कहकर बुलाते थे।
अपनी मोहब्बत छुपा कर,
दूसरों की कहानी हम सरे आम सबको सुनाते थे।
दूसरों को समझ कर कम, हम खुदपर कई बार इतराते थे।
दोस्त ही थे शायद तब सब कुछ हमारे,
शायद इसलिए ही हम उनके लिए इस दुनियाँ से भी लड़ जाते थे।  

जीवन की गाड़ी, आगे बड़ी तो समझ आया,
अब तक के जीवन का अहम हिस्सा तो,
हमने केवल पढ़ -पढ़ कर ही है बिताया।
जितना समझमे आया, मैं उतना ही तो परीक्षा में लिख पाया।
बाकी का मटीरियल तो आज भी उन्ही बेरंग किताबो में है समाया।

फिर क्यों मैं खुदके साथ ही छल कर,जीवन में आगे बड़ रहा हूँ।
जाना कहाँ है मुझे और मैं कहाँ हूँ??
वक़्त बीता और  पिता का बैंक बैलेंस भी कुछ ज़्यादा बचा नहीं था।
तब जाके समझ आया अरे ये तो मुझे करना ही नहीं था।
अंतर मन को भाने वाला, मेरा वो पैशन ही सही था।

डिग्री  का बोझ अब सताने लगा,
नौकरी लग कर भी छूट गई,
मुझे ऐसे देख, इस दुनियाँ को भी मज़ा आने लगा।
फिर क्या?? हम भी क्या अपना साथ छोड़ देते?
अपनी क्षमताओं से क्या हम ही अपना मुँह मोड़ लेते ?
हाथ थामा खुदका और खुदको ही एक नई दिशा दिखाई।
डिग्रीयों के दम पर नहीं, हमने अपने हौसले की क्षमताओं से,
अपनी ये ज़िन्दगी सजाई।

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