वो कल ही की तो बात थी — लेखिका प्रेरणा

प्रेरणा मेहरोत्रा ​​गुप्ता की कविता
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी,
डाटती धमकाती तो क्या,  तेरे साये की तो आस थी ,
आज तो रह गई मैं अकेली, मगर खुश हूँ,
 कुछ पल के लिए, तो तू मेरे साथ थी ,
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी.
वो कल ही की तो बात थी जब तन्हाई मुझसे नाराज़ थी
खुश रहती, गाया करती समझौते भरी ज़िन्दगी में भी एक आस थी
आज तो रह गई मैं अकेली,मगर खुश हूँ अकेले रहना सीख गई ,
जो कल तक एक ख्यालो की बात थी,
वो कल ही की तो बात थी जब तन्हाई मुझसे नाराज़ थी
वो कल ही की तो बात थी जब धूप में भी छाव थी
पड़े पैर में छाले भी तो क्या, उन मुलायम हाथो की तो आस थी
आज तो रह गई मैं  अकेली, अपनी मैं  प्यारी सखी सहेली
वो कल ही की तो बात थी जब धूप में भी छाव थी.
वो कल ही की तो बात थी जब दुनिया मेरे साथ थी
आई मुसीबत तो छोड़ गये सब, सबको मनवानी जो अपनी बात थी
वो कल ही की तो बात थी जब दुनियां मेरे साथ थी
वो कल ही की तो बात थी
जब दिल में बहुत सी बात थी, कह देती तो आज यू ना रोती
उस पल में कुछ तो ख़ास बात थी
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी
दूर सही तो क्या, तेरे मिलने की तो आस थी
तेरे हाथो मे जो बात थी -वो क्या हमारी आख़री मुलाकात थी??
आज तो रह गई  मैं अकेली-बिन तेरे हूँ मैं अधूरी
उन लम्हो में जो बात थी जब संग तू मेरे साथ थी
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी।

लेखिका

प्रेरणा मेहरोत्रा ​​गुप्ता

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