प्राण जाये मगर मोबाइल ना जाये — लेखिका प्रेरणा

प्रेरणा मेहरोत्रा ​​गुप्ता की कविता
प्राण जाये मगर मोबाइल ना जाये।
किस-किस को और कैसे हम इस दुनियां की ये दुविधा सुनाये??
खाना खाने बैठे ही थे कि, हमारे फोन की घंटी बज गई।
खबर सुनी जो, हमारी सूरत भी, दुल्हन के जैसी सज गई।
फिर क्या खाना छोड़, हम अपने घर से निकल गये,
कही गिरे, तो कही हम, संभल गये।
खाना खाते तो शायद ,ऊर्जा हममे भरपूर रहती।
मेरी माँ भी बात-बात पर, फिर हमसे ये ना कहती।
मोबाइल का साथ छोड़ अब ज़रा ,
घर के कामो में भी, दिमाग लगाया कर।
सौ तरीके की सेल्फी लेकर, मुझे इतराकर मत दिखाया कर।
अब इसका मोह छोड़ और किताबो से नाता जोड़,
तेरी इन हरकतों का और नहीं कोई तोड़।
अब सुनकर माँ की बात, हमने कुछ दिन तो,
मोबाइल की तरफ भी ना देखा।
बनाली हमने भी, हमारे और मोबाइल के दरमियाँ एक लक्ष्मण रेखा।
कुछ दिन तो,ये सिलसिला चलता रहा,
वाट्सअप के मेसजो की बस आवाज़ ही सुन, ये मन मचलता रहा।
फिर क्या माँ मैके गई और हमने फिर ये दिल,
 अपना मोबाइल में लगा लिया।
अपने को खुश कर पहले,
अपने दोस्तों को भी इन्हीं कामो में लगा दिया।
हमारी ज़िन्दगी ने ही फिर हमे ये सबक सिखा दिया।

 

मोबाइल की लत एक ऐसी बिमारी है।

जिसका हर वक़्त में प्रयोग पड़ सकता हम सब पर भारी है।

लेखिका

प्रेरणा मेहरोत्रा ​​गुप्ता

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