पहचान नामा — लेखिका शैली

शैली कालरा की कविता

इस जन्नतें फ़िज़ा
जहाँ हम रहते हैं
जिसे हम मुल्क भी कहते हैं

कौन सी मिट्टी अपनी,
क्या और किसे हम
अपना कहते हैं ?

फ़क़ीर से हैं हम
इस जाने पहचाने
हर शहर में,

जहाँ पूछ कर
होती है पहचान
दस्तखतओं से
नाम की क़ीमत
शक्ल से नहीं
काग़ज़ों से होती है

चंद पन्ने,
बयान करतें हैं
वजूद होने का अपना,

छिपा है नाम जो
जिसे हम
अपना सा कहते हैं,
अपना होकर भी
गुमशूदा है जो,

बस ….पहचान तो
पहचान नामे से होती है

लेखिका शैली कालरा

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